रफ़ीक़ अल-मुस्लिम
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बद्र की लड़ाई

सीरत-ए-नबवी
मदनी दौर — 2 हिजरी1 मिनट का पाठ

हिजरत के दूसरे साल रमज़ान में, लगभग तीन सौ कुछ मुसलमानों का सामना क़ुरैश की सेना से हुआ, जिसमें लगभग एक हज़ार लड़ाके थे। अल्लाह ने ईमान वालों को उनकी कम संख्या के बावजूद जीत दी और फ़रिश्तों से उनकी मदद की, और अबू जहल जैसे क़ुरैश के सरदार मारे गए। बद्र का दिन यौमुल-फ़ुरक़ान (फ़ैसले का दिन) था, जिसके ज़रिए अल्लाह ने हक़ और बातिल के बीच फ़र्क़ कर दिया।

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