रफ़ीक़ अल-मुस्लिम
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फ़िक्र और ग़म के समय की दुआ

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    اللهم إني عبدك، ابن عبدك، ابن أمتك، ناصيتي بيدك، ماض في حكمك، عدل في قضاؤك، أسألك بكل اسم هو لك، سميت به نفسك، أو أنزلته في كتابك، أو علمته أحدا من خلقك، أو استأثرت به في علم الغيب عندك، أن تجعل القرآن ربيع قلبي، ونور صدري، وجلاء حزني، وذهاب همي.

    ऐ अल्लाह, मैं तेरा बंदा हूँ, तेरे बंदे का बेटा हूँ, तेरी बंदी का बेटा हूँ; मेरी पेशानी तेरे हाथ में है, मुझ पर तेरा हुक्म जारी है, और मेरे बारे में तेरा फ़ैसला इंसाफ़ वाला है। मैं तुझसे तेरे हर उस नाम के वसीले से सवाल करता हूँ जो तेरा है, जिससे तूने ख़ुद को पुकारा, या अपनी किताब में उतारा, या अपनी मख़लूक़ में से किसी को सिखाया, या जिसे तूने अपने पास इल्म-ए-ग़ैब में महफ़ूज़ रखा, कि तू क़ुरआन को मेरे दिल की बहार, मेरे सीने का नूर, मेरे ग़म को दूर करने वाला और मेरी फ़िक्र को मिटाने वाला बना दे।

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    اللهم إني أعوذ بك من الهم والحزن، والعجز والكسل، والبخل والجبن، وضلع الدين وغلبة الرجال.

    ऐ अल्लाह, मैं तेरी पनाह माँगता हूँ फ़िक्र और ग़म से, कमज़ोरी और सुस्ती से, कंजूसी और बुज़दिली से, क़र्ज़ के बोझ से और लोगों के ग़लबे से।

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