रफ़ीक़ अल-मुस्लिम
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सोने से पहले के अज़कार

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    يجمع كفيه ثم ينفث فيهما فيقرأ فيهما: بسم الله الرحمن الرحيم " قل هو الله أحد * الله الصمد* لم يلد ولم يولد* ولم يكن له كفوا أحد ". بسم الله الرحمن الرحيم " قل أعوذ برب الفلق* من شر ما خلق* ومن شر غاسق إذا وقب* ومن شر النفاثات في العقد* ومن شر حاسد إذا حسد ". بسم الله الرحمن الرحيم " قل أعوذ برب الناس* ملك الناس* إله الناس* من شر الوسواس الخناس* الذي يوسوس في صدور الناس* من الجنة و الناس " ثم يمسح بهما ما استطاع من جسده يبدأ بهما على رأسه ووجهه وما أقبل من جسده (يفعل ذلك ثلاث مرات).

    आप अपनी दोनों हथेलियाँ मिलाते, फिर उनमें फूँकते, और उनमें पढ़ते: अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम वाला है। "कहो, वह अल्लाह एक है, अल्लाह बेनियाज़ है। न उसकी कोई औलाद है और न वह किसी की औलाद है, और न कोई उसके बराबर है।" अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम वाला है। "कहो, मैं सुबह के रब की पनाह माँगता हूँ, हर उस चीज़ की बुराई से जो उसने पैदा की, और अँधेरी रात की बुराई से जब वह छा जाए, और गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से, और हसद करने वाले की बुराई से जब वह हसद करे।" अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम वाला है। "कहो, मैं इंसानों के रब की पनाह माँगता हूँ, इंसानों के बादशाह की, इंसानों के माबूद की, वसवसा डालकर पीछे हट जाने वाले की बुराई से, जो इंसानों के सीनों में [बुरे] वसवसे डालता है, चाहे वह जिन्नों में से हो या इंसानों में से।" फिर आप उनसे अपने जिस्म के जितने हिस्से तक हाथ पहुँचता उस पर फेरते, सिर, चेहरे और जिस्म के अगले हिस्से से शुरू करते (आप ऐसा तीन बार करते)।

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  2. 2 / 13

    " الله لا إله إلا هو الحي القيوم لا تأخذه سنة ولا نوم له ما في السموات وما في الأرض من ذا الذي يشفع عنده إلا بإذنه يعلم ما بين أيديهم وما خلفهم ولا يحيطون بشيء من علمه إلا بما شاء وسع كرسيه السموات والأرض ولا يؤوده حفظهما وهو العلي العظيم ".

    " अल्लाह - उसके सिवा कोई माबूद नहीं, वह हमेशा ज़िंदा है, सारी कायनात को क़ायम रखने वाला है। न उसे ऊँघ आती है न नींद। जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है सब उसी का है। कौन है जो उसकी इजाज़त के बिना उसके पास सिफ़ारिश कर सके? वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है, और वे उसके इल्म में से किसी चीज़ का अहाता नहीं कर सकते सिवाय उसके जो वह चाहे। उसकी कुर्सी आसमानों और ज़मीन पर फैली हुई है, और उनकी हिफ़ाज़त उसे थकाती नहीं। और वह सबसे बुलंद, सबसे अज़ीम है "।

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  3. 3 / 13

    " آمن الرسول بما أنزل إليه من ربه والمؤمنون كل آمن بالله وملآئكته وكتبه ورسله لا نفرق بين أحد من رسله وقالوا سمعنا وأطعنا غفرانك ربنا وإليك المصير* لا يكلف الله نفسا إلا وسعها لها ما كسبت وعليها ما اكتسبت ربنا لا تؤاخذنا إن نسينا أو أخطأنا ربنا ولا تحمل علينا إصرا كما حملته على الذين من قبلنا ربنا ولا تحملنا ما لا طاقة لنا به واعف عنا واغفر لنا وارحمنآ أنت مولانا فانصرنا على القوم الكافرين ".

    " रसूल उस पर ईमान लाया जो उसके रब की तरफ़ से उस पर नाज़िल किया गया, और [इसी तरह] ईमान वाले भी। ये सब अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी किताबों पर और उसके रसूलों पर ईमान लाए, [यह कहते हुए कि] ‘हम उसके रसूलों में से किसी के बीच फ़र्क़ नहीं करते।’ और उन्होंने कहा, ‘हमने सुना और हमने इताअत की। ऐ हमारे रब, [हम] तेरी माफ़ी [चाहते हैं], और तेरी ही तरफ़ लौटना है’* अल्लाह किसी जान पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डालता। उसके लिए वही है जो उसने भलाई कमाई, और उस पर वही है जो उसने बुराई कमाई। ‘ऐ हमारे रब, अगर हम भूल जाएँ या ग़लती कर बैठें तो हमारी पकड़ न करना। ऐ हमारे रब, और हम पर ऐसा बोझ न डाल जैसा तूने हमसे पहले के लोगों पर डाला था। ऐ हमारे रब, और हमसे वह बोझ न उठवा जिसकी हममें ताक़त नहीं। और हमें माफ़ कर दे, और हमें बख़्श दे, और हम पर रहम फ़रमा। तू ही हमारा मौला है, तो काफ़िर क़ौम के मुक़ाबले में हमारी मदद फ़रमा "।

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  4. 4 / 13

    باسمك ربي وضعت جنبي، وبك أرفعه، فإن أمسكت نفسي فارحمها، وإن أرسلتها فاحفظها، بما تحفظ به عبادك الصالحين.

    ऐ मेरे रब, तेरे नाम से मैं लेटता हूँ और तेरे ही नाम से उठता हूँ। अगर तू मेरी जान ले ले तो उस पर रहम फ़रमाना, और अगर तू उसे वापस भेज दे तो उसकी वैसे ही हिफ़ाज़त फ़रमाना जैसे तू अपने नेक बंदों की हिफ़ाज़त करता है।

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  5. 5 / 13

    اللهم إنك خلقت نفسي وأنت توفاها، لك مماتها ومحياها، إن أحييتها فاحفظها، وإن أمتها فاغفر لها. اللهم إني أسألك العافية.

    ऐ अल्लाह, बेशक तूने ही मेरी जान को पैदा किया और तू ही उसे वापस लेगा। उसकी मौत और उसकी ज़िंदगी तेरे ही लिए है। अगर तू उसे ज़िंदा रखे तो उसकी हिफ़ाज़त फ़रमा, और अगर तू उसे मौत दे तो उसे बख़्श दे। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे आफ़ियत माँगता हूँ।

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  6. 6 / 13

    اللهم قني عذابك يوم تبعث عبادك.

    ऐ अल्लाह, जिस दिन तू अपने बंदों को दोबारा उठाएगा, उस दिन मुझे अपने अज़ाब से बचा लेना।

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  7. 7 / 13

    باسمك اللهم أموت وأحيا.

    ऐ अल्लाह, तेरे ही नाम से मैं मरता हूँ और जीता हूँ।

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  8. 8 / 13

    سبحان الله (ثلاثا وثلاثين) والحمد لله (ثلاثا وثلاثين) والله أكبر (أربعا وثلاثين).

    अल्लाह पाक है (33 बार कहें), सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है (33 बार कहें), और अल्लाह सबसे बड़ा है (34 बार कहें)।

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  9. 9 / 13

    اللهم رب السموات السبع ورب الأرض، ورب العرش العظيم، ربنا ورب كل شيء، فالق الحب والنوى، ومنزل التوراة والإنجيل، والفرقان، أعوذ بك من شر كل شيء أنت آخذ بناصيته. اللهم أنت الأول فليس قبلك شيء، وأنت الآخر فليس بعدك شيء، وأنت الظاهر فليس فوقك شيء، وأنت الباطن فليس دونك شيء، اقض عنا الدين وأغننا من الفقر.

    ऐ अल्लाह, सातों आसमानों के रब और ज़मीन के रब, अर्श-ए-अज़ीम के रब, हमारे रब और हर चीज़ के रब, दाने और गुठली को फाड़ने वाले, तौरात, इंजील और फ़ुरक़ान को नाज़िल करने वाले, मैं हर उस चीज़ की बुराई से तेरी पनाह माँगता हूँ जिसकी पेशानी तू पकड़े हुए है। ऐ अल्लाह, तू ही अव्वल है, तुझसे पहले कुछ नहीं; तू ही आख़िर है, तेरे बाद कुछ नहीं; तू ही ज़ाहिर (सबसे बुलंद) है, तेरे ऊपर कुछ नहीं; और तू ही बातिन (सबसे क़रीब) है, तुझसे ज़्यादा क़रीब कुछ नहीं। हमारा क़र्ज़ अदा कर दे और हमें ग़रीबी से बेनियाज़ कर दे।

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  10. 10 / 13

    الحمد لله الذي أطعمنا وسقانا، وكفانا، وآوانا، فكم ممن لا كافي له ولا مؤوي.

    सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है जिसने हमें खिलाया और पिलाया, और हमारे लिए काफ़ी हुआ और हमें ठिकाना दिया, क्योंकि कितने ही ऐसे हैं जिनके लिए न कोई काफ़ी होने वाला है और न कोई ठिकाना देने वाला।

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  11. 11 / 13

    اللهم عالم الغيب والشهادة فاطر السموات والأرض، رب كل شيء ومليكه، أشهد أن لا إله إلا أنت، أعوذ بك من شر نفسي، ومن شر الشيطان وشركه، وأن أقترف على نفسي سوءا، أو أجره إلى مسلم.

    ऐ अल्लाह, ग़ैब और हाज़िर के जानने वाले, आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले, हर चीज़ के रब और मालिक, मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। मैं अपने नफ़्स की बुराई से, और शैतान की बुराई और उसके शिर्क से तेरी पनाह माँगता हूँ, और इस बात से कि मैं अपने नफ़्स पर कोई ज़ुल्म करूँ या किसी मुसलमान पर ऐसा कुछ लाऊँ।

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  12. 12 / 13

    يقرأ " الم " تنزيل السجدة ، وتبارك الذي بيده الملك.

    वह पढ़ते "अलिफ़-लाम-मीम" [सूरह] अस-सजदह, और तबारकल्लज़ी बियदिहिल-मुल्क [सूरह अल-मुल्क]।

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  13. 13 / 13

    اللهم أسلمت نفسي إليك، وفوضت أمري إليك، ووجهت وجهي إليك، وألجأت ظهري إليك، رغبة ورهبة إليك، لا ملجأ ولا منجا منك إلا إليك، آمنت بكتابك الذي أنزلت، وبنبيك الذي أرسلت.

    ऐ अल्लाह, मैंने अपने आप को तेरे सुपुर्द किया, अपना मामला तेरे हवाले किया, अपना चेहरा तेरी तरफ़ किया, और अपनी पीठ तेरे सहारे लगाई, तेरी चाहत और तेरे डर से। तुझसे बचने की कोई पनाह और कोई निजात की जगह नहीं सिवाय तेरे। मैं तेरी उस किताब पर ईमान लाया जो तूने नाज़िल की, और तेरे उस नबी पर जिसे तूने भेजा।

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