قال صلى الله عليه وسلم من قال: سبحان الله وبحمده في يوم مائة مرة حطت خطاياه ولو كانت مثل زبد البحر)).
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: "जो व्यक्ति दिन में सौ बार कहे: सुब्हानअल्लाहि व बिहम्दिही (अल्लाह पाक है, और सारी तारीफ़ उसी के लिए है), उसके गुनाह मिटा दिए जाएँगे चाहे वे समुद्र के झाग के बराबर हों।"
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وقال صلى الله عليه وسلم: ((من قال لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك، وله الحمد، وهو على كل شيء قدير عشر مرار، كان كمن أعتق أربعة أنفس من ولد إسماعيل)).
आप ने यह भी फ़रमाया: "जो व्यक्ति दस बार कहे: ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीका लहू, लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु, व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर (अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं; बादशाहत उसी की है और तारीफ़ उसी के लिए है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है), वह उस व्यक्ति की तरह होगा जिसने इस्माईल की औलाद में से चार ग़ुलाम आज़ाद किए।"
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وقال صلى الله عليه وسلم: ((كلمتان خفيفتان على اللسان، ثقيلتان في الميزان، حبيبتان إلى الرحمن: سبحان الله وبحمده، سبحان الله العظيم)).
आप ने यह भी फ़रमाया: "दो कलिमे ऐसे हैं जो ज़बान पर हल्के, तराज़ू में भारी, और रहमान को प्यारे हैं: सुब्हानअल्लाहि व बिहम्दिही, सुब्हानअल्लाहिल-अज़ीम (अल्लाह पाक है और सारी तारीफ़ उसी के लिए है; अज़मत वाला अल्लाह पाक है)।"
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وقال صلى الله عليه وسلم: ((لأن أقول سبحان الله، والحمد لله، ولا إله إلا الله، والله أكبر، أحب إلي مما طلعت عليه الشمس)).
आप ने यह भी फ़रमाया: "मेरा यह कहना: सुब्हानअल्लाह, वल-हम्दुलिल्लाह, व ला इलाहा इल्लल्लाह, वल्लाहु अकबर (अल्लाह पाक है, सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है, अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, और अल्लाह सबसे बड़ा है) मुझे उन सब चीज़ों से ज़्यादा प्यारा है जिन पर सूरज निकलता है।"
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وقال صلى الله عليه وسلم: ((أيعجز أحدكم أن يكسب كل يوم ألف حسنة)) فسأله سائل من جلسائه كيف يكسب أحدنا ألف حسنة؟ قال: ((يسبح مائة تسبيحة، فيكتب له ألف حسنة أو يحط عنه ألف خطيئة)).
आप ने यह भी फ़रमाया: "क्या तुम में से कोई हर दिन हज़ार नेकियाँ कमाने से आजिज़ है?" आपके पास बैठे लोगों में से एक ने पूछा: "हम में से कोई हज़ार नेकियाँ कैसे कमा सकता है?" आप ने फ़रमाया: "सौ बार सुब्हानअल्लाह कहने से उसके लिए हज़ार नेकियाँ लिखी जाती हैं, या उसके हज़ार गुनाह मिटा दिए जाते हैं।"
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من قال: سبحان الله العظيم وبحمده غرست له نخلة في الجنة.
जो व्यक्ति कहे: सुब्हानअल्लाहिल-अज़ीमि व बिहम्दिही (अज़मत वाला अल्लाह पाक है, और सारी तारीफ़ उसी के लिए है), उसके लिए जन्नत में खजूर का एक पेड़ लगा दिया जाता है।
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وقال صلى الله عليه وسلم: ((يا عبد الله بن قيس ألا أدلك على كنز من كنوز الجنة))؟ فقلت: بلى يا رسول الله، قال: ((قل لا حول ولا قوة إلا بالله)).
आप ने यह भी फ़रमाया: "ऐ अब्दुल्लाह बिन क़ैस! क्या मैं तुम्हें जन्नत के ख़ज़ानों में से एक ख़ज़ाना न बताऊँ?" मैंने कहा: "क्यों नहीं, ऐ अल्लाह के रसूल।" आप ने फ़रमाया: "कहो: ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह (अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है न कोई क़ुव्वत)।"
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وقال صلى الله عليه وسلم: ((أحب الكلام إلى الله أربع: سبحان الله، والحمد لله، ولا إله إلا الله، والله أكبر، لا يضرك بأيهن بدأت)).
आप ने यह भी फ़रमाया: "अल्लाह को सबसे प्यारे कलिमे चार हैं: सुब्हानअल्लाह, वल-हम्दुलिल्लाह, व ला इलाहा इल्लल्लाह, वल्लाहु अकबर (अल्लाह पाक है, सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है, अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, और अल्लाह सबसे बड़ा है); इनमें से जिससे भी शुरू करो, कोई हर्ज नहीं।"
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جاء أعرابي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: علمني كلاما أقوله: قال: ((قل: لا إله إلا الله وحده لا شريك له، الله أكبر كبيرا، والحمد لله كثيرا، سبحان الله رب العالمين، لا حول ولا قوة إلا بالله العزيز الحكيم)) قال: فهؤلاء لربي، فما لي؟ قال: ((قل: اللهم اغفر لي، وارحمني، واهدني، وارزقني)).
एक देहाती अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पास आया और कहा: "मुझे कुछ कलिमे सिखा दीजिए जो मैं कहा करूँ।" आप ने फ़रमाया: "कहो: ला इलाहा इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरीका लह, अल्लाहु अकबरु कबीरा, वल-हम्दुलिल्लाहि कसीरा, सुब्हानअल्लाहि रब्बिल-आलमीन, ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल-अज़ीज़िल-हकीम (अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं; अल्लाह बहुत ही बड़ा है; अल्लाह के लिए बहुत ज़्यादा तारीफ़ है; अल्लाह पाक है, जो सारे जहानों का रब है; ज़बरदस्त, हिकमत वाले अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है न कोई क़ुव्वत)।" उस व्यक्ति ने कहा: "ये तो मेरे रब के लिए हैं, मेरे लिए क्या है?" आप ने फ़रमाया: "कहो: अल्लाहुम्मग़फ़िर ली, वरहमनी, वहदिनी, वरज़ुक़नी (ऐ अल्लाह! मुझे माफ़ कर दे, मुझ पर रहम फ़रमा, मुझे हिदायत दे, और मुझे रोज़ी दे)।"
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كان الرجل إذا أسلم علمه النبي صلى الله عليه وسلم الصلاة ثم أمره أن يدعو بهؤلاء الكلمات: ((اللهم اغفر لي، وارحمني، واهدني، وعافني وارزقني)).
जब कोई व्यक्ति इस्लाम क़बूल करता तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उसे नमाज़ पढ़ना सिखाते, फिर उसे इन शब्दों से दुआ करने का हुक्म देते: "अल्लाहुम्मग़फ़िर ली, वरहमनी, वहदिनी, व आफ़िनी, वरज़ुक़नी (ऐ अल्लाह! मुझे माफ़ कर दे, मुझ पर रहम फ़रमा, मुझे हिदायत दे, मुझे आफ़ियत दे, और मुझे रोज़ी दे)।"
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إن أفضل الدعاء الحمد لله، وأفضل الذكر لا إله إلا الله.
सबसे बेहतर दुआ अल-हम्दुलिल्लाह (सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है) है, और सबसे बेहतर ज़िक्र ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं) है।
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الباقيات الصالحات : سبحان الله والحمد لله، ولا إله إلا الله،والله أكبر،و لا حول ولا قوة إلا بالله
अल-बाक़ियातुस-सालिहात (हमेशा बाक़ी रहने वाले नेक अमल) ये हैं: सुब्हानअल्लाह, वल-हम्दुलिल्लाह, व ला इलाहा इल्लल्लाह, वल्लाहु अकबर, व ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह (अल्लाह पाक है, सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है, अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, अल्लाह सबसे बड़ा है, और अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है न कोई क़ुव्वत)।