रफ़ीक़ अल-मुस्लिम
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सुबह के अज़कार

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  1. 1 / 30

    بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيم اللّهُ لاَ إِلَهَ إِلاَّ هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ لاَ تَأْخُذُهُ سِنَةٌ وَلاَ نَوْمٌ لَّهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الأَرْضِ مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِنْدَهُ إِلاَّ بِإِذْنِهِ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلاَ يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلاَّ بِمَا شَاء وَسِعَ كُرْسِيُّهُ السَّمَاوَاتِ وَالأَرْضَ وَلاَ يَؤُودُهُ حِفْظُهُمَا وَهُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيمُ.

    अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है। अल्लाह — उसके सिवा कोई माबूद नहीं, वह हमेशा ज़िंदा रहने वाला, [सारी] कायनात को क़ायम रखने वाला है। न उसे ऊँघ आती है और न नींद। जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है, सब उसी का है। कौन है जो उसकी इजाज़त के बिना उसके पास सिफ़ारिश कर सके? वह जानता है जो कुछ उनके सामने है और जो कुछ उनके पीछे है, और वे उसके इल्म में से किसी चीज़ का भी अहाता नहीं कर सकते सिवाय उसके जो वह चाहे। उसकी कुर्सी आसमानों और ज़मीन पर छाई हुई है, और उनकी हिफ़ाज़त उसे थकाती नहीं। और वही सबसे बुलंद, सबसे अज़ीम है।

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  2. 2 / 30दोहराएँ: 3 बार

    بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيم قُلْ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ ﴿١﴾ ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ ﴿٢﴾ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ ﴿٣﴾ وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُوًا أَحَدُ ﴿٤﴾

    अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है। कहो, "वह अल्लाह है, [जो] एक है, अल्लाह बेनियाज़ है। न उसकी कोई औलाद है और न वह किसी की औलाद है, और न कोई उसके बराबर है।"

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  3. 3 / 30दोहराएँ: 3 बार

    بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيم قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلْفَلَقِ ﴿١﴾ مِن شَرِّ مَا خَلَقَ ﴿٢﴾ وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ ﴿٣﴾ وَمِن شَرِّ ٱلنَّفَّٰثَٰتِ فِي ٱلْعُقَدِ ﴿٤﴾ وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ ﴿٥﴾

    अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है। कहो, "मैं सुबह के रब की पनाह माँगता हूँ, उस चीज़ की बुराई से जो उसने पैदा की, और अंधेरी रात की बुराई से जब वह छा जाए, और गिरहों में फूँकने वालियों की बुराई से, और हसद करने वाले की बुराई से जब वह हसद करे।"

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  4. 4 / 30दोहराएँ: 3 बार

    بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيم قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ ﴿١﴾ مَلِكِ ٱلنَّاسِ ﴿٢﴾ إِلَٰهِ ٱلنَّاسِ ﴿٣﴾ مِن شَرِّ ٱلْوَسْوَاسِ ٱلْخَنَّاسِ ﴿٤﴾ ٱلَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ ٱلنَّاسِ ﴿٥﴾ مِنَ ٱلْجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ ﴿٦﴾

    अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है। कहो, "मैं इंसानों के रब की पनाह माँगता हूँ, इंसानों के बादशाह की, इंसानों के माबूद की, उस वसवसा डालने वाले की बुराई से जो पीछे हट जाता है — जो इंसानों के सीनों में [बुरे] वसवसे डालता है — चाहे वह जिन्नों में से हो या इंसानों में से।"

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  5. 5 / 30

    أَصْبَحْنا وَأَصْبَحَ المُلْكُ لله وَالحَمدُ لله ، لا إلهَ إلاّ اللّهُ وَحدَهُ لا شَريكَ لهُ، لهُ المُلكُ ولهُ الحَمْد، وهُوَ على كلّ شَيءٍ قدير ، رَبِّ أسْأَلُكَ خَيرَ ما في هذا اليوم وَخَيرَ ما بَعْدَه ، وَأَعوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ ما في هذا اليوم وَشَرِّ ما بَعْدَه، رَبِّ أَعوذُبِكَ مِنَ الْكَسَلِ وَسوءِ الْكِبَر ، رَبِّ أَعوذُ بِكَ مِنْ عَذابٍ في النّارِ وَعَذابٍ في القَبْر.

    हमने नए दिन में प्रवेश किया और इसके साथ सारी बादशाही अल्लाह की है, और सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है। अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। उसी की बादशाही है और उसी के लिए तारीफ़ है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। ऐ मेरे रब, मैं तुझसे इस दिन की भलाई और इसके बाद की भलाई माँगता हूँ, और इस दिन की बुराई और इसके बाद की बुराई से तेरी पनाह माँगता हूँ। ऐ मेरे रब, मैं सुस्ती और बुढ़ापे की ख़राबी से तेरी पनाह माँगता हूँ। ऐ मेरे रब, मैं आग के अज़ाब और क़ब्र के अज़ाब से तेरी पनाह माँगता हूँ।

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  6. 6 / 30

    اللّهمَّ أَنْتَ رَبِّي لا إلهَ إلاّ أَنْتَ ، خَلَقْتَني وَأَنا عَبْدُك ، وَأَنا عَلى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ ما اسْتَطَعْت ، أَعوذُبِكَ مِنْ شَرِّ ما صَنَعْت ، أَبوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ وَأَبوءُ بِذَنْبي فَاغْفِرْ لي فَإِنَّهُ لا يَغْفِرُ الذُّنوبَ إِلاّ أَنْتَ .

    ऐ अल्लाह, तू मेरा रब है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। तूने मुझे पैदा किया और मैं तेरा बंदा हूँ, और मैं अपनी ताक़त भर तेरे अहद और वादे पर क़ायम हूँ। मैंने जो कुछ किया उसकी बुराई से तेरी पनाह माँगता हूँ। मैं अपने ऊपर तेरी नेमत का इक़रार करता हूँ, और अपने गुनाह का इक़रार करता हूँ, तो मुझे माफ़ कर दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई गुनाह माफ़ नहीं करता।

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  7. 7 / 30दोहराएँ: 4 बार

    اللّهُمَّ إِنِّي أَصْبَحْتُ أُشْهِدُك ، وَأُشْهِدُ حَمَلَةَ عَرْشِك ، وَمَلَائِكَتَكَ ، وَجَميعَ خَلْقِك ، أَنَّكَ أَنْتَ اللهُ لا إلهَ إلاّ أَنْتَ وَحْدَكَ لا شَريكَ لَك ، وَأَنَّ ُ مُحَمّداً عَبْدُكَ وَرَسولُك.

    ऐ अल्लाह, मैंने सुबह की और मैं तुझे, तेरे अर्श उठाने वालों को, तेरे फ़रिश्तों को और तेरी सारी मख़लूक़ को गवाह बनाता हूँ कि तू ही अल्लाह है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, तू अकेला है, तेरा कोई शरीक नहीं, और यह कि मुहम्मद तेरे बंदे और तेरे रसूल हैं।

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  8. 8 / 30

    اللّهُمَّ ما أَصْبََحَ بي مِنْ نِعْمَةٍ أَو بِأَحَدٍ مِنْ خَلْقِك ، فَمِنْكَ وَحْدَكَ لا شريكَ لَك ، فَلَكَ الْحَمْدُ وَلَكَ الشُّكْر.

    ऐ अल्लाह, आज सुबह मुझ पर या तेरी किसी भी मख़लूक़ पर जो भी नेमत हुई है, वह सिर्फ़ तेरी ही तरफ़ से है, तेरा कोई शरीक नहीं। तो सारी तारीफ़ तेरे ही लिए है और सारा शुक्र तेरा ही है।

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  9. 9 / 30दोहराएँ: 7 बार

    حَسْبِيَ اللّهُ لا إلهَ إلاّ هُوَ عَلَيهِ تَوَكَّلتُ وَهُوَ رَبُّ العَرْشِ العَظيم.

    मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है। उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। उसी पर मैंने भरोसा किया, और वही अज़ीम अर्श का रब है।

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  10. 10 / 30दोहराएँ: 3 बार

    بِسمِ اللهِ الذي لا يَضُرُّ مَعَ اسمِهِ شَيءٌ في الأرْضِ وَلا في السّماءِ وَهوَ السّميعُ العَليم.

    अल्लाह के नाम से, जिसके नाम के साथ ज़मीन या आसमान की कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुँचा सकती, और वह सब कुछ सुनने वाला, सब कुछ जानने वाला है।

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  11. 11 / 30

    اللّهُمَّ بِكَ أَصْبَحْنا وَبِكَ أَمْسَينا ، وَبِكَ نَحْيا وَبِكَ نَمُوتُ وَإِلَيْكَ النُّشُور.

    ऐ अल्लाह, तेरे ही हुक्म से हमने सुबह की और तेरे ही हुक्म से हमने शाम की, तेरे ही हुक्म से हम जीते हैं और तेरे ही हुक्म से मरते हैं, और तेरी ही तरफ़ उठकर जाना है।

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  12. 12 / 30

    أَصْبَحْنا عَلَى فِطْرَةِ الإسْلاَمِ، وَعَلَى كَلِمَةِ الإِخْلاَصِ، وَعَلَى دِينِ نَبِيِّنَا مُحَمَّدٍ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، وَعَلَى مِلَّةِ أَبِينَا إبْرَاهِيمَ حَنِيفاً مُسْلِماً وَمَا كَانَ مِنَ المُشْرِكِينَ.

    हमने नए दिन में इस्लाम की फ़ितरत पर, इख़लास के कलिमे पर, अपने नबी मुहम्मद — सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम — के दीन पर, और अपने पिता इब्राहीम की मिल्लत पर प्रवेश किया, जो यकसू होकर अल्लाह के फ़रमाँबरदार थे, और वे अल्लाह के साथ शरीक ठहराने वालों में से नहीं थे।

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  13. 13 / 30दोहराएँ: 3 बार

    سُبْحانَ اللهِ وَبِحَمْدِهِ عَدَدَ خَلْقِه ، وَرِضا نَفْسِه ، وَزِنَةَ عَرْشِه ، وَمِدادَ كَلِماتِه.

    अल्लाह पाक है और उसी की तारीफ़ है, उसकी मख़लूक़ की गिनती के बराबर, उसकी रज़ा के बराबर, उसके अर्श के वज़न के बराबर, और उसके कलिमात की मात्रा के बराबर।

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  14. 14 / 30दोहराएँ: 3 बार

    اللّهُمَّ عافِني في بَدَني ، اللّهُمَّ عافِني في سَمْعي ، اللّهُمَّ عافِني في بَصَري ، لا إلهَ إلاّ أَنْتَ.

    ऐ अल्लाह, मेरे बदन को आफ़ियत दे। ऐ अल्लाह, मेरी सुनने की ताक़त को आफ़ियत दे। ऐ अल्लाह, मेरी देखने की ताक़त को आफ़ियत दे। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।

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  15. 15 / 30दोहराएँ: 3 बार

    اللّهُمَّ إِنّي أَعوذُ بِكَ مِنَ الْكُفر ، وَالفَقْر ، وَأَعوذُ بِكَ مِنْ عَذابِ القَبْر ، لا إلهَ إلاّ أَنْتَ.

    ऐ अल्लाह, मैं कुफ़्र और ग़रीबी से तेरी पनाह माँगता हूँ, और क़ब्र के अज़ाब से तेरी पनाह माँगता हूँ। तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं।

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  16. 16 / 30

    اللّهُمَّ إِنِّي أسْأَلُكَ العَفْوَ وَالعافِيةَ في الدُّنْيا وَالآخِرَة ، اللّهُمَّ إِنِّي أسْأَلُكَ العَفْوَ وَالعافِيةَ في ديني وَدُنْيايَ وَأهْلي وَمالي ، اللّهُمَّ اسْتُرْ عوْراتي وَآمِنْ رَوْعاتي ، اللّهُمَّ احْفَظْني مِن بَينِ يَدَيَّ وَمِن خَلْفي وَعَن يَميني وَعَن شِمالي ، وَمِن فَوْقي ، وَأَعوذُ بِعَظَمَتِكَ أَن أُغْتالَ مِن تَحْتي.

    ऐ अल्लाह, मैं तुझसे दुनिया और आख़िरत में माफ़ी और आफ़ियत माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे अपने दीन और दुनिया के मामलों में, और अपने घर वालों और अपने माल में माफ़ी और आफ़ियत माँगता हूँ। ऐ अल्लाह, मेरे ऐबों पर पर्दा डाल दे और मेरे डर को अमन में बदल दे। ऐ अल्लाह, मेरी हिफ़ाज़त कर मेरे आगे से और मेरे पीछे से, मेरे दाएँ से और मेरे बाएँ से, और मेरे ऊपर से, और मैं तेरी अज़मत की पनाह माँगता हूँ इस बात से कि मैं अपने नीचे से (ज़मीन में) धँसा दिया जाऊँ।

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  17. 17 / 30दोहराएँ: 3 बार

    يَا حَيُّ يَا قيُّومُ بِرَحْمَتِكَ أسْتَغِيثُ أصْلِحْ لِي شَأنِي كُلَّهُ وَلاَ تَكِلْنِي إلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ.

    ऐ हमेशा ज़िंदा रहने वाले, ऐ ख़ुद क़ायम रहने वाले और सबको क़ायम रखने वाले, तेरी रहमत के वसीले से मैं मदद माँगता हूँ। मेरे सारे मामले दुरुस्त कर दे, और मुझे पलक झपकने भर के लिए भी मेरे नफ़्स के हवाले न कर।

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  18. 18 / 30

    أَصْبَحْنا وَأَصْبَحْ المُلكُ للهِ رَبِّ العالَمين ، اللّهُمَّ إِنِّي أسْأَلُكَ خَيْرَ هذا اليَوْم ، فَتْحَهُ ، وَنَصْرَهُ ، وَنورَهُ وَبَرَكَتَهُ ، وَهُداهُ ، وَأَعوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ ما فيهِ وَشَرِّ ما بَعْدَه.

    हमने नए दिन में प्रवेश किया और इसके साथ सारी बादशाही अल्लाह की है, जो सारे जहानों का रब है। ऐ अल्लाह, मैं तुझसे इस दिन की भलाई माँगता हूँ: इसकी कामयाबी, इसकी मदद, इसका नूर, इसकी बरकतें और इसकी हिदायत, और मैं इसमें मौजूद बुराई से और इसके बाद की बुराई से तेरी पनाह माँगता हूँ।

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  19. 19 / 30

    اللّهُمَّ عالِمَ الغَيْبِ وَالشّهادَةِ فاطِرَ السّماواتِ وَالأرْضِ رَبَّ كلِّ شَيءٍ وَمَليكَه ، أَشْهَدُ أَنْ لا إِلهَ إِلاّ أَنْت ، أَعوذُ بِكَ مِن شَرِّ نَفْسي وَمِن شَرِّ الشَّيْطانِ وَشِرْكِهِ ، وَأَنْ أَقْتَرِفَ عَلى نَفْسي سوءاً أَوْ أَجُرَّهُ إِلى مُسْلِم.

    ऐ अल्लाह, छिपे और खुले के जानने वाले, आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले, हर चीज़ के रब और मालिक, मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। मैं अपने नफ़्स की बुराई से, और शैतान की बुराई और उसके शिर्क से तेरी पनाह माँगता हूँ, और इस बात से कि मैं अपने ऊपर कोई बुराई लाऊँ या किसी मुसलमान को उसकी तरफ़ ले जाऊँ।

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  20. 20 / 30दोहराएँ: 3 बार

    أَعوذُ بِكَلِماتِ اللّهِ التّامّاتِ مِنْ شَرِّ ما خَلَق.

    मैं अल्लाह के मुकम्मल कलिमात की पनाह माँगता हूँ उस चीज़ की बुराई से जो उसने पैदा की।

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  21. 21 / 30दोहराएँ: 10 बार

    اللَّهُمَّ صَلِّ وَسَلِّمْ وَبَارِكْ على نَبِيِّنَا مُحمَّد.

    ऐ अल्लाह, हमारे नबी मुहम्मद पर दुरूद, सलाम और बरकतें नाज़िल फ़रमा।

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  22. 22 / 30दोहराएँ: 3 बार

    اللَّهُمَّ إِنَّا نَعُوذُ بِكَ مِنْ أَنْ نُشْرِكَ بِكَ شَيْئًا نَعْلَمُهُ ، وَنَسْتَغْفِرُكَ لِمَا لَا نَعْلَمُهُ.

    ऐ अल्लाह, हम इस बात से तेरी पनाह माँगते हैं कि जानते-बूझते किसी चीज़ को तेरा शरीक ठहराएँ, और जो हम नहीं जानते उसके लिए तुझसे माफ़ी माँगते हैं।

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  23. 23 / 30दोहराएँ: 3 बार

    اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ الْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ الْجُبْنِ وَالْبُخْلِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ غَلَبَةِ الدَّيْنِ، وَقَهْرِ الرِّجَالِ.

    ऐ अल्लाह, मैं फ़िक्र और ग़म से तेरी पनाह माँगता हूँ, और बेबसी और सुस्ती से तेरी पनाह माँगता हूँ, और बुज़दिली और कंजूसी से तेरी पनाह माँगता हूँ, और क़र्ज़ के बोझ तले दब जाने और लोगों के मुझ पर हावी हो जाने से तेरी पनाह माँगता हूँ।

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  24. 24 / 30दोहराएँ: 3 बार

    أسْتَغْفِرُ اللهَ العَظِيمَ الَّذِي لاَ إلَهَ إلاَّ هُوَ، الحَيُّ القَيُّومُ، وَأتُوبُ إلَيهِ.

    मैं अल्लाह अज़ीम से माफ़ी माँगता हूँ, जिसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, जो हमेशा ज़िंदा रहने वाला, ख़ुद क़ायम रहने वाला और सबको क़ायम रखने वाला है, और मैं तौबा करके उसी की तरफ़ लौटता हूँ।

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  25. 25 / 30दोहराएँ: 3 बार

    يَا رَبِّ , لَكَ الْحَمْدُ كَمَا يَنْبَغِي لِجَلَالِ وَجْهِكَ , وَلِعَظِيمِ سُلْطَانِكَ.

    ऐ रब, सारी तारीफ़ तेरे ही लिए है, जैसी तेरे चेहरे के जलाल और तेरी सल्तनत की अज़मत के लायक़ है।

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  26. 26 / 30

    اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نَافِعًا، وَرِزْقًا طَيِّبًا، وَعَمَلًا مُتَقَبَّلًا.

    ऐ अल्लाह, मैं तुझसे फ़ायदेमंद इल्म, पाकीज़ा रोज़ी और क़बूल होने वाले अमल माँगता हूँ।

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  27. 27 / 30

    اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لا إِلَهَ إِلا أَنْتَ ، عَلَيْكَ تَوَكَّلْتُ ، وَأَنْتَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ , مَا شَاءَ اللَّهُ كَانَ ، وَمَا لَمْ يَشَأْ لَمْ يَكُنْ ، وَلا حَوْلَ وَلا قُوَّةَ إِلا بِاللَّهِ الْعَلِيِّ الْعَظِيمِ , أَعْلَمُ أَنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ ، وَأَنَّ اللَّهَ قَدْ أَحَاطَ بِكُلِّ شَيْءٍ عِلْمًا , اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ نَفْسِي ، وَمِنْ شَرِّ كُلِّ دَابَّةٍ أَنْتَ آخِذٌ بِنَاصِيَتِهَا ، إِنَّ رَبِّي عَلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ.

    ऐ अल्लाह, तू मेरा रब है, तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं। तुझ पर ही मैंने भरोसा किया, और तू अज़ीम अर्श का रब है। जो अल्लाह चाहे वह होता है, और जो वह न चाहे वह नहीं होता। अल्लाह के सिवा न कोई ताक़त है न कोई क़ुव्वत, जो सबसे बुलंद, सबसे अज़ीम है। मैं जानता हूँ कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है, और अल्लाह ने अपने इल्म से हर चीज़ का अहाता कर रखा है। ऐ अल्लाह, मैं अपने नफ़्स की बुराई से और हर उस जानदार की बुराई से तेरी पनाह माँगता हूँ जिसकी पेशानी तेरे क़ब्ज़े में है। बेशक मेरा रब सीधे रास्ते पर है।

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  28. 28 / 30दोहराएँ: 100 बार

    لَا إلَه إلّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءِ قَدِيرِ.

    अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। उसी की बादशाही है और उसी के लिए तारीफ़ है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।

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  29. 29 / 30दोहराएँ: 100 बार

    سُبْحانَ اللهِ وَبِحَمْدِهِ.

    अल्लाह पाक है और उसी की तारीफ़ है।

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  30. 30 / 30दोहराएँ: 100 बार

    أسْتَغْفِرُ اللهَ وَأتُوبُ إلَيْهِ

    मैं अल्लाह से माफ़ी माँगता हूँ और तौबा करके उसी की तरफ़ लौटता हूँ।

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